Mimansa

मीमांसा दर्शन​

मीमांसा दर्शन में धर्म व उसके लक्षण का व्याख्यान किया गया है l

‘‘इसमें धर्म और धर्मी का विचार किया गया है और प्रत्यक्ष वा अनुमान इन्हीं दो प्रमाणों को माना है। धर्म का लक्षण करते हुए इन्होंने वर्णन किया है कि वेद-आज्ञा ही धर्म का लक्षण है।७३’’ जनश्रुति यह है कि यह शास्त्र यज्ञों का वर्णन करता है किंतु यज्ञों के वर्णन के साथ-साथ यह शास्त्र अन्य अनेक विषयों का वर्णन करता है, जैसे वेद किस प्रकार ईश्वरकृत तथा नित्य हैं, वेदों के साथ विरोध पाये जाने से अन्य ग्रन्थों का कैसे प्रमाण्य है, किन-किन वर्णों को यज्ञादि करने का अधिकार है, ब्राह्मणादि वर्णों के उपनयन कर्म क्या हैं? इत्यादि अनेक विषयों की मीमांसा इस शास्त्र में की गई है।

            यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन्।

            ते ह नाकं महिमान: सचन्त यत्र पूर्वे साध्या: सन्ति देवा:॥ —यजु० ३१.१६

अर्थ—उस परम पूजनीय परमात्मा का ज्ञानरूप यज्ञ से विद्वान् लोग पूजन करते हैं और पूजारूप धर्मों को धारण करते हुए दु:ख से सर्वथा रहित उस (नाकं) स्वर्ग पद को प्राप्त होते हैं, जिसको साधन सम्पन्न पुरुष पूर्व सृष्टियों में प्राप्त हुए हैं।

यही स्वर्ग मीमांसाशास्त्र का एकमात्र लक्ष्य है और ज्ञानयज्ञ तथा कर्मयज्ञ सब इसी के साधन वर्णन किये गये हैं, इसी स्वर्ग की सिद्धि के लिए परमात्मा के इस बृहत् ब्रह्माण्ड में अहॢनश वसन्त ऋतुरूप घृत, ग्रीष्म ऋतुरूप समिधा और शरद ऋतुरूप हवि: से हवन हो रहा है। इसी स्वर्ग के साधन सब कर्म मीमांसा में कथन किये गये हैं, जिनका विस्तार इस शास्त्र में भले प्रकार पाया जाता है पर उनमें प्रधान तीन ही याग हैं, जिनको प्रकृति याग कहा जाता है। अर्थात् एक ‘‘दर्शपूर्णमास’’ दूसरा ‘‘ज्योतिष्टोम’’ जिसको ‘‘सोम’’ याग भी कहते हैं और तीसरा ‘‘अश्वमेध’’ इनके अतिरिक्त और सब इनकी विकृति हैं, इसलिए उक्त तीनों याग ‘‘प्रकृतियाग’’ कहलाते हैं, ‘‘दर्शपूर्णमास’’ घृत दधि, पय तथा अन्न साध्य याग हैं, यह याग दर्श=अमावस्या और पूर्णमास=चन्द्रमा के पूर्ण होने वाले पर्व में किया जाता है, इसलिए इसका नाम ‘‘दर्शपूर्णमास’’ है और ‘‘ज्योतिष्टोम’’ सोम आदि औषध रस साध्य याग है, इसमें ज्योति:=स्वत:प्रकाशमान परमात्मा की स्तुति की जाती है, इस याग की सात संस्था हैं, (१) अग्निष्टोम (२) षोड़शी (३) अतिरात्र (४) अत्यग्निष्टोम (५) आप्तोर्याम (६) उक्थ्य (७) वाजपेय, इनका विशेष वर्णन मी० ३.६.४१ आदि के भाष्य में स्पष्ट है। अश्वमेध याग में केवल दानयोग्य पशुओं का दान किया जाता है, यहाँ उसके विस्तार की आवश्यकता नहीं।

मीमांसा में कुल सूत्रों की संख्या २७४५ है।

छहों दर्शनों में मीमांसा सबसे बड़ा दर्शन है, इसका क्षेत्र समस्त वैदिक वाङ्मय में व्याप्त है, अत: इसकी क्लिष्टता कुछ बढ़ जाती है। इसमें बारह अध्याय हैं, नौ अध्यायों में चार-चार पाद हैं और तीसरे, छठे और दसवें अध्यायों में आठ-आठ पाद हैं। इनके अतिरिक्त चतुरध्यायात्मक संकर्ष काण्ड है, जिसे द्वादशाध्यायात्मक पूर्वमीमांसा का परिशिष्ट कहा जा सकता है। पूर्वमीमांसा के बारह अध्यायों में प्रतिपादित विषय संक्षेपत: निम्न प्रकार है—

१. प्रथम अध्याय ‘प्रमाणलक्षण’ कहा गया है। इसके प्रथम पाद में विधि वाक्यों का प्रामाण्य, द्वितीय पाद में अर्थवाद एवं मन्त्र का प्रामाण्य, तृतीय पाद में मन्वादि स्मृतियों का प्रामाण्य और चतुर्थपाद में उद्भिद् आदि की नामधेयता (संज्ञा) का प्रामाण्य प्रतिपादित है।

२. द्वितीय अध्याय ‘‘नानाकर्मलक्षण’’ कहा गया है, जिसके प्रथम पाद में अपूर्व आदि उपोद्धात, द्वितीय पाद में कर्म के भेद, तीसरे पाद में कर्मभेद, प्रामाण्य के अपवाद और चतुर्थपाद में नित्य-काम्य प्रयोगों का भेद निरूपित किया गया है।

३. तृतीय अध्याय ‘शेषविनियोगलक्षण’ कहा गया है। इसके प्रथमपाद में अङ्गत्व के बोधक छह प्रमाणों में से श्रुति, द्वितीय पाद में लिङ्ग, तृतीय पाद में वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्या का विवेचन, चतुर्थ पाद में श्रुति आदि का परस्पर विरोध-अविरोध, पञ्चम पाद में प्रतिपत्तिकर्म, षष्ठ पाद में अनारभ्याधीत, सप्तम पाद में प्रधानोपकारक कर्म और अष्टम पाद में यजमान के कर्मों पर विचार किया गया है।

४. चतुर्थ अध्याय ‘प्रयोजकाप्रयोजकलक्षण’ कहा गया है। इसके प्रथम पाद में प्रधान का प्रयोजकत्व, द्वितीय पाद में अप्रधान का प्रयोजकत्व, तृतीय पाद में द्रव्य-संस्कार-कर्मों का फलादि और चतुर्थ पाद में मुख्य-गौण अङ्गत्वादि का विवेचन किया गया है।

५. पञ्चम अध्याय ‘क्रमनियमलक्षण’ कहा गया है। इसके प्रथम पाद में श्रुति-अर्थ-पाठ का क्रम, द्वितीय पाद में क्रमविशेष, तृतीय पाद में वृद्धि-अवृद्धि आदि और चतुर्थ पाद में श्रुति आदि में पूर्व-पूर्व प्राबल्य का निरूपण है।

६. षष्ठ अध्याय के प्रथम पाद में कर्मानुष्ठान में अधिकारी, द्वितीय पाद में अधिकारी के धर्म, तृतीय पाद में मुख्य के अभाव में प्रतिनिधि का ग्रहण, चतुर्थ पाद में कर्म का लोप, पञ्चम पाद में कालादि की विगुणता में प्रायश्चित्त, षष्ठ पाद में सत्र के अधिकारी, सप्तपाद में पित्रादि का अदेयत्व और अष्टम पाद में लौकिक अग्नि में होम का निरूपण है।

७. सप्तम अध्याय के प्रथम प्राद में प्रत्यक्ष वचनों से अतिदेश, द्वितीय पाद में पूर्वोक्त अतिदेश का शेष, तृतीय पाद में अग्निहोत्र नाम से अतिदेश और चतुर्थ पाद में लिङ्ग का अतिदेश प्रतिपादित है।

८. अष्टम अध्याय के प्रथम पाद में स्पष्ट लिङ्गों से अतिदेश, द्वितीय पाद में अस्पष्ट लिङ्गों से अतिदेश, तृतीय पाद में प्रबल लिङ्ग से अतिदेश और चतुर्थ पाद में अतिदेश के अपवादों का निरूपण किया गया है।

९. नवम अध्याय के प्रथम पाद में ऊह का आरम्भ, द्वितीय पाद में साम का ऊह, तृतीय पाद में मन्त्र का ऊह और चतुर्थ पाद में मन्त्रोह पर प्रासङ्गिक विवेचन है।

१०. दशम अध्याय के प्रथम पाद में बाध के हेतु द्वार-लोप, द्वितीय पाद में द्वार-लोप का विस्तार, तृतीयपाद में बाध के कारण कार्य-सम्बन्धी समानता, चतुर्थ पाद में बाध-कारण के अभाव में समुच्चय, पञ्चम पाद में बाध के प्रसङ्ग से ग्रहादि, षष्ठ पाद में बाध के प्रसङ्ग से नाम सम्बन्धी विचार, सप्तम पाद में बाध सम्बन्धी सामान्य विचार और अष्टम पाद में नञर्थ सम्बन्धी विचार है।

११. एकादश अध्याय के प्रथम पाद में तन्त्र का आरम्भ, द्वितीय पाद में तन्त्र एवं आवाप, तृतीय पाद में तन्त्र का विस्तार और चतुर्थ पाद में आवाप का विस्तार निरूपित किया गया है।

१२. द्वादश अध्याय के प्रथम पाद में प्रसङ्ग, द्वितीय पाद में तन्त्रियों (=साधारण धॢमयों) का निर्णय, तृतीय पाद में समुच्चय और चतुर्थ पाद में विकल्प का विवेचन है॥७५

यज्ञशाला ही प्राचीन ऋषियों की प्रयोगशाला होती  थी। अग्रि, जल और दुग्ध आदि द्रव्य भी वहीं उपस्थित रहते थे। विविध प्रकार के यौगिकों (ष्शद्वश्चशह्वठ्ठस्रह्य) का साकल होता था। अग्नि में आहुति देने से विविध प्रकार की औषध-युक्त वायु उत्सॢजत होती थी। यजमान अथवा् विद्यार्थी को पुरोहित वैज्ञानिक यज्ञ का महत्त्व उपयोग व प्रयोग सिखलाते जाते थे। इसलिए ही वेदमन्त्रों का उच्चारण होता था। याज्ञिक प्रयोगों के समय यजमान और पुरोहित दोनों ही स्थिरतापूर्वक बैठे रहते थे। सामग्री इतनी अल्प होती थी, प्रयोग इतने सटीक होते थे कि अतिरिक्त सावधानियों (क्कह्म्द्गष्ड्डह्वह्लद्बशठ्ठड्डह्म्4 द्वद्गड्डह्यह्वह्म्द्गह्य) की आवश्यकता ही नहीं होती थी। इस प्रकार प्रायोगिक विधि से शिक्षण होता था और साथ में वातावरण की शुद्धि से परोपकार भी होता था। यज्ञरूपी प्रयोगशाला बंद प्रकोष्ठ में न होकर पुष्प-वल्लरियों से घिरी प्राकृतिक वातावरण में होती थी। स्वल्प लागत से महान् उन्नतिकारक इस विद्या की वर्तमान काल में पुन:स्थापना की परम आवश्यकता है।

Overview

योग विद्या का मूल स्त्रोत क्या है ?

  • योग विद्या का मूल स्रोत वेद है
  • वेद के आधार पर ही विभिन्न शास्त्रकारों ने अपने अपने ढंग से योग विद्या का वर्णन किया है
  • आधुनिक काल में महर्षि पतंजलि ने योग को दर्शन के रूप में क्रमबद्ध कर योग दर्शन का निर्माण किया

योग क्या है ?

  • योग: चित्तवृत्तिनिरोध: अर्थात चित्त की वृत्तियों को पूर्णत: रोकना योग है

मन की वृत्तियाँ कौन-कौन सी हैं?
Accordion Content
उन्हें रोकने के क्या उपाय है ?

  • योगाभ्यासी व्यक्ति ही इन वृत्तियों को समझकर मन में उठने वाले विभिन्न नकारात्मक भावों (इर्षा, द्वेष, अहंकार, लोभ, मोह आदि) को रोक पाने में सक्षम होता है
  • ईश्वर की सहायता से ही इन भावों का समाधान संभव है
  • इन कुसंस्कारों को हटाने की विस्तृत प्रक्रिया योग दर्शन में प्राप्त होती है

Benefits

जब तक इन्द्रियाँ बहिर्मुखी होती हैं, तब तक परमेश्वर का ध्यान कदापि सम्भव नहीं है।
इसलिए ईश्वर की सच्ची भक्ति के लिये योग-दर्शन एक अनुपम शास्त्र है।

पाठ्यक्रम

प्रथम अध्याय
द्वितीय अध्याय
प्रथम अध्याय

प्रथम पाद

  • धर्म व उसके लक्षण
  • धर्म के निमित्त की परीक्षा
  • शब्द की नित्यता
  •  

द्वितीय अध्याय

अभी रजिस्टर करें